
Education Resource Society (ERS)
A thematic group working on holistic child rights Our Vision:A society where all get equal opportunity for learning and development.
Saturday, August 18, 2018
दर्जनो ग्रामीण युवाओ को डिजिटल पैरोकारी के सिखाये गये गुर

Saturday, June 9, 2018
आदिवासी महिलाओं ने सम्पूर्ण समाधान दिवस पर उठाई अपनी मांगे-

A story of suffering from HIV/AIDS and the last fatal stage of T.B.
The story is a mirror shows
the real scene of harmful effects of ignorance and cruelty of our society. It
is a case study of Swati singh (Changed Name) who stands between life and death today. She
is suffering from HIV/AIDS and the last fatal stage of T.B. (M.D.R.). Today her
condition is as critical as no one wants to stay with her.
Swati, who is 25 years old, is belonging to the
weaker section and a resident of Harro G.P. of Shankergarh Block of Allahabad
Distt. She is married before 6th years ago, with Balwan Singh,
resident of Kaundhiyar Block of Allahabad Distt. He works in a Cloth Factory of
Madhya Pradesh, where he lived with Swati. Their married life was good. After
few years of marriage she suffered from fever and cough but due to ignorance
time was passing away, she and her husband didn’t give serious attention
towards this side. With ignorance they didn’t move to Dr. and thus they were
not come to know about the specific disease and gradually Swati was getting
physically week and becoming thin and lean. With passage of time Balwan was
getting irritated with swati’s ill health and this situation made worse for
their relationship. It resulted that Balwan sent her to Kaundhiyar to his
family where no one were ready to adjust with swati. Family members were also
not aware that in this situation they should take swati to Dr. All this situation moved to swati to her fatal
condition. In this situation family started to harass swati. Then swati
called to her mother and told about her critical condition. Her mother brought swati to her home and sent her to Dr. where after 8 months continue treatment
when no positive result was found then her mother moved to Parvati Hospital
where after checkup it is found that swati is seriously suffered from
HIV/AIDS and the last critical and fatal stage of T.B. (M.D.R.). All family
members got shocked to know this and became worried about swati. All local
pvt. hospital denied to admit swati at that time.
Swati’s family requested to the ERS representative for
help. At the time ERS representative got the help of 108 and undertook the
responsibility of admitting her in the SRN Hospital of Allahabad. Seeing
the serious condition of swati SRN denied to admit her. ERS’s representative
took the help from DM and CMO then counselor Nandini Sharma of A.R.T. center
and other Doctors of SRN hospital, supported completely in this regard finally Sw was admitted to SRN hospital now her is in Oxygen waratid and getting
a right treatment under continuous doctors vigil.
Today Swati’s husband and her sasural members are only
responsible for her serious condition. As they didn’t took her to the Dr. even
seeing her becoming serious. Rather providing right treatment to Swati, her
husband kept on giving her general medicines from medical stores, when her
condition was getting serious continuously they started to harass Swati. Even
they didn’t take any information for a year about Swati after she came to her
home. Thus a complaint on dowry has been filed in Kaudhiyar Station against her’s Sasural members through complaining on women help line no. 181 and 1090
and the next process will be proceeded after improvement in her’s condition,
moreover her sasural members are continuous under inquiry by Kaundhiyar police
station. If Swati got the right treatment in right time, she might be away
from her this fatal condition. Today she and her family are thankful to ERS
and prayed to God to save Swati, who wants to live her life.
After having 22 days continuous treatment Swati got improvement
in her condition and she is discharged from the SRN hospital on 14 of April
2018. She is at her home, she with her whole family is highly grateful of ERS
as ERS representative was always with her during treatment and getting
information of her treatment.
Tuesday, February 20, 2018
Learning outcome workshop with SMC members
स्कूल प्रबंध समिति के सदस्यों के साथ अधिगम सम्प्राप्ति पर एक दिवसीय कार्यशाला संपन्न
सरकारी आकड़ो के अनुसार आयुवर्ग 6-14 वर्ष के बच्चों का नामांकन स्कूलों में बेशक शत- प्रतिशत के आसपास पहुँच चुकी हो परंतु शिक्षा की गुणवत्ता पर आज भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा है जिसे असर सहित विभिन्न रिपोर्टो में जिक्र किया जाता है। रिपोर्टो के आधार पर जहा एक ओर सरकार मानती है की बच्चों लर्निंग आउटकम कमजोर है वही जमीनी स्तर पर बच्चो की सीखने की प्रगति से अभिभावक भी संतुष्ट नहीं है. हर तरफ बच्चो के शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़े सवाल खड़े हो रहे है दोषी कौन यह विवादित विषय है किंतु सुधार के क्या रास्तेहो यह महत्वपूर्ण है बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता के बेहतरी के दिशा में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् ने हर स्तर पर अधिगम के मानक तय करते हुए दिशानिर्देश जारी किया । जिसे राष्ट्रीय स्तर के साथ उत्तर प्रदेश सरकार भी परिपालन के लिए प्रतिबद्ध है। यह संदर्भ जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान इलाहाबाद में एजुकेशन रिसोर्स सोसाइटी द्वारा आयोजितप्रशिक्षण शिविर में रहा। प्रशिक्षण में डॉ0नवनीत ने शंकरगढ आदिवासी क्षेत्र से आये 2दर्जन से अधिक स्कूल प्रबंध समिति के सदस्यों व अभिभावकों को बच्चो के सीखने का स्तर समझाने का प्रयास किया साथ ही सीखने के स्तर को बेहतर बनाने को फोकस करते तकनीकी जानकारी प्रदान किया. इस प्रकिया में अभिभावकों की भूमिका को ब्यापकता में देखने के लिए प्रोत्साहित किया. प्रशिक्षण में ख़ासकर कलरव पुस्तक पर आधरित बहुशिक्षण पद्धतियों, बच्चो के साथ विषयगत परिचर्चा एवं संदर्भो से बच्चो को चिंतनशील बनाने के आवश्याकता बताया. उन्होंने यह भी कहा कि अधिगम सिर्फ स्कूल का विषय नहीं है अपितु यह संस्कृतिक विविधता व् रचनात्मकता से जुडा मामला है. सदस्यों ने अधिगम स्तर समझने के गुर को सीखा और कहा की वे बच्चो व स्कूल के साथ समन्वय स्थापित करते हुए काम करेंगे. अंत में संस्था निदेशक ने प्रतिभागियों को धन्यवाद व डॉ.नवनीत जी, संशाधन का उपयोग हेतु डायट प्राचार्य का आभार ब्यक्त करते हुए कार्यशाला समापन किया.
Monday, November 6, 2017
बुनियादी सुविधाओ से वंचित गांव दद्दा का पुरा , , , ,
बुनियादी सुविधाओ से
वंचित गांव
दद्दा का पुरा , , , ,
इलाहाबाद जिले का शंकरगढ ब्लाक सबसे
पिछ्डा विकास खंड के रूप मे जाना जाता है. इसी विकासखंड की कोहडिया ग्राम पंचायत
का एक गाव दद्दा का पुरा है जो मुख्य गाव से लगभग 1.5 किलोमीटर बाहर बसा है. यहा सामाजिक
संस्था “ एजुकेशन रिसोर्स सोसाइटी ” जब यहा बच्चो के अधिकारो पर काम करना शुरु
किया तो पाया कि यहा के नागरिक व बच्चे बहुत ही निरीह स्थिति मे जीवन जी रहे है इस
बसाहट का इतिहास पता करने के लिये यहा के सबसे बयोवृद्ध 65 वर्षीय राम कृपाल कोल से बातचीत किया उन्होने बताया कि लगभग 40-45
वर्ष पूर्व वे अपनी युवा अवस्था मे ग्राम मझियारी से यहाँ काम के लिये आये थे. उस
समय पत्थर खदानो मे अवैध रूप से बेरोक-टोक काम चलता
था. यही पत्थर खनन का काम करते और झोपाडिया डाल कर रह्ने लगे. जैसे-जैसे खनन का
काम तेज हुआ रिश्तेदारो और जान-पह्चान के लोगो को आना बढता गया और धीरे-धीरे
झोपडियो की झुंड बस्ती मे तब्दील गयी. बस्ती बसने से किसानो और ठेकेदारो को भी कोई
आपत्ति नही थी क्यो कि भुखमरी और बेबसी का दंश झेल रहे मजदूरो से कडी मेह्नत के
एवज मे औने-पौने दाम ही देने पडते थे. कृपाल कोल बताते है कि उन्हे इस बात का इल्म तो था कि
श्रम का उचित मूल्य नही है पर दबंगई का खौफ और काम से निकाले जाने के डर से चुप्पी
साध लेते. नब्बे के दशक मे जब सामजिक संस्थाओ ने शंकरगढ मे मजदूरो के कल्याण एवम
अधिकार के मुहिम की शुरुवात हुयी तो यहाँ के मजदूर भी शामिल हुये. एक बैठक मे इस
बात पर गहन चर्चा का विषय रहा कि गाव का नाम क्या रखा जाये? काफी चर्चा के बाद दादा राम किशुन के नाम पर
दद्दा का पुरा नाम पर सर्व सम्मति से मुहर लगी. जिसकी लिखा-पढी करके उपजिलधिकारी
समेत उत्तर प्रदेश शासन तक भेजा गया जिससे कि अधिकारिक रूप से राजस्व गाव घोषित हो
सके. जो अब तक सम्भव नही हो सका.
सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक रूप से पिछ्डे दद्दा का पुरा का गाव बेशक विकास
की धारा से वंचित रहा है परन्तु राजनैतिक भागीदारी हेतु विभिन्न दलो ने वोट का
अधिकार जरूर दिला दिया. जिसका असर सिर्फ चुनावी बिगुल फुकने से लेकर सत्ता पर आसीन
होने तक दिखता है उसके बाद न कोई पलट कर देखता है और ना ही विकास की गंगा की कोई
लहर दिखाई देती है और उम्मीदो का दीपक फिर से बुझता नजर आते ही सब फिर से
रोजी-रोटी के जुगत मे लग जाते है. यहाँ के लोगो की जीविका श्रम पर आधारित है अभी
तक तो पत्थर खनन मे पुरुष एवम महिला दोनो बराबरी से काम करते रहे और अपना व अपने
बच्चो के पेट के लिये दो वक्त के भोजन का जुगाड करते लेते. इसके अलावा और कोई उपाय
ना था. वर्षो खदानो मे काम करने के बाद यहा के खनिया मजदूरो को श्रम विभाग या अन्य
किसी द्वारा ना तो अधिकारिक तौर मजदूर का दर्जा दिया और ना ही किसी को श्रम मंत्रालय
से कोई लाभ मिला. और अब तो माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पत्थर खनन पर रोक लगने के
बाद मजदूरो की रोजी भी गयी. जिससे यहाँ के लोगो का शहरो की तरफ पलायन भी तेज हुआ इसका
प्रभाव भी बच्चो पर प्रतिकूल ही पडा. इसी
गाव के निवासी राजधर कोल बताते है कि इंदिरा जी के जमाने मे 15-20 लोगो को 1-1
बीघे का खेती हेतु पट्टा दिया गया था जो पटेलो के कब्जे मे है बहुत प्रयास के बाद
भी जमीने कोलो के हाथ मे नही आ सकी जिसका एक प्रमुख कारण यह रहा कि कोलो की एकता
को दबंगो ने जमींदोह कर दिया इस नेक काम मे प्रशासन भी समय-समय पर दबंगो के साथ
खडा हुआ उक्त बातो को कहते-कहते राजधर बहुत दुखी हो जाते है.
दद्दा का पुरा मे बुनियादी सुविधाओ का पूर्णरूप
से आभाव दिखाई देता है. शैक्षिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो इस गाव की ग्राम पंचायत कोहडिया
मे प्राथमिक स्तर से लेकर 8वी तक का सरकारी स्कूल स्थपित किया गया है जो यहा से
तकरीबन 1.5 किलोमीटर से अधिक दूरी पर अवस्थित है. जहा प्राथमिक स्तर के बच्चो का
पहुचना कठिन है दूसरी ओर ग्राम पंचायत पंडित के पुरा मे प्राथमिक स्कूल है जिसकी
दूरी 1 किलोमीटर पर है परन्तु जाने वाले रास्ते पर खुदी हुई खदाने बच्चो के लिये
जोखिम भरी है 80 परिवारो के इस दलित पुरवे मे 6-14 आयुवर्ग के लगभग 99 बच्चे है
जिसमे से लगभग मात्र 45 बच्चे विभिन्न स्कूलो मे नामांकित है जिसमे से भी नियमित
स्कूल जाने वाले बच्चो की संख्या दहाई नही पार कर पाते. शेष 54 बच्चे स्कूल से
बाहर है. उत्तर प्रदेश मे शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हुए भले ही एक पंचवर्षीय
से अधिक हो गया हो. परंतु यहाँ के बच्चो के लिये यह कानून बेमानी साबित हो रहा है जो
बच्चो के अधिकारो का सीधा हनन का मामला बनता है. शायद यही कारण है कि इस गाव मे अब
तक 9वी कक्षा तक सालू और 10वी कक्षा तक सिर्फ राजधर ही पढ पाये है स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त एक भी आदमी
नही मिलेगा. यहा के बच्चे अधिकतर पह्ली पीढी के पढने वाले बच्चे है. इसी तरह 3-6
वर्ष के कुल 38 बच्चे है परन्तु यहाँ अब तक कोई आगनवाडी केंद्र नही स्थापित किया
गया है. जिसके कारण ना तो बच्चो को पूर्व प्राथमिक शिक्षा की कोई व्यावस्था हो पा रही है और ना ही गर्भवती/धात्री
माताओ व किशोरियो को महिला एवम बाल विकास विभाग की कोई सेवाए मिल पा रही है. यही
नही बुनियादी सुविधाओ के नाम पर सरकार द्वारा सिर्फ 3 हैंड पम्प इस गांव मे लगाये
गये है जो फरवरी माह के आते ही पानी देना बंद कर देते है या घंटे भर इंतजार के बाद
1/2 बाल्टी ही पानी दे पाते है और गर्मी के दिनो मे लोगो की दिनचर्या पानी की
व्यवस्था पर अटक जाती है. तथा यह समस्या बरसात आने के बाद ही सुधरती है. इन दिनो
मे सरकार की तरफ से इस मामले मे कुछ भी नही हो पाता. यहा का पेयजल स्वस्थ्य की दृष्टि बिल्कुल ठीक नही है. पानी हैंड्पम्प से निकलने
के बाद घंटे भर मे अजीब सा लाल रंग ले लेता है. जानकारो के अनुसार पानी अर्शेनिक, आयरन की अधिकता एवम फ्लोराइड युक्त है जो लोगो
एवम बच्चो को गम्भीर बीमारी की चपेट मे ले लेता है. इसके अलावा इस गाव मे लेपित
सम्पर्क मार्ग, बिजली आदि की व्यवस्था आज तक नही हो पाई.
भारतीय संविधान मे नागरिको के मौलिक अधिकारो को रखा
गया है जिसके तहत मानव के मूल आवश्यकताओ, सम्मानपूर्ण जीवन
जींने का अधिकार सुनिशिचित करना राज्य की जिम्मेदारी
है. परन्तु यहा की स्थिति देखने पर दुखद लगता है और सरकारी कार्य प्रणाली पर
दर्जनो प्रश्न चिन्ह लग जाते है. आज जरूरत इस बात की है कि हमारी कार्यपालिका, न्याय पलिका व व्यावस्थपिका व
अन्य तंत्र इस गाव भ्रमण करे और
वास्तविक्ता से रूबरू होने के साथ-साथ नागरिक व बाल अधिकारो को स्थापित करने हेतु
उचित कदम उठाये.
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